Friday, 13 January 2012

पहले इस देश के नेताओं ने इस देश का बटवारा किया , अब ये इस समाज को अन्दर से बाटने की कोशिश कर रहें हैं / पांच साल तक किसी को याद नहीं याद रहता है की मेरी बिरादरी और मेरे धर्म का कमजोर और गरीब आदमी किस हालत में है, और उसकी सामाजिक सरोकारों को कैसे दूर किया जाय / / लेकिन चुनाव के मौके पर इतना जरूर याद आ जाता है कि इस इलाके में ठाकुर ज्यादा , उस इलाके में बाभन ज्यादा हैं , यहाँ कुर्मी ज्यादा हैं और वहां मुसलमान ज्यादा हैं. और उसी हिसाब से उम्मेदवारी घोषित की जाती है /
टिकेट बाँटते वक़्त ये नेता जिस कांफिडेंस से जाति और धर्म की गडित से टिकेट बाँटते हैं , उसको देख कर हैरत होती है कि कब तक ये जनता को बेवकूफ समझते रहेंगें /लगता है आजादी के ६५ साल बाद भी, ये देश की भोली भाली जनता की भावनाओं को कुरेदते रहेंगे , और जाति और धर्म की राजनीति, अपने हित को साधने में इस्तेमाल करते रहेंगे और पब्लिक को बेवकूफ बनाते रहेंगे /
समाज को बांटने की इस देशद्रोही शाजिश में मीडिया का भी काफी हाँथ है / जिस तरह की जाति और धर्म आधारित विश्लेषण ये मीडिया के बन्दर / एंकर करते हैं , उससे लगता है की ये नेताओं की रही सही कमी भी पूरी कर देते हैं / इनको कैसे पता होता है की कुर्मी कुर्मी को , और बाभन , बाभन को सिर्फ इसलिए vote देदेगा क़ि वह उसकी जाति बिरादरी का है / कोई सिर्फ मेरी जाति बिरादरी का होने की वजह से मेरा कौन सा भला कर देगा , ये बात क्या पब्लिक नहीं जानती है / ये अपनी मदारीगिरी को कोई भी नाम देदेगें जैसे सामाजिक इन्जिनीरिंग या कोई और नाम / समय कि मांग है कि इन नेताओं को बताया जाय कि अब हम जाति और धर्म के नाम पर नही विकास और भ्रसटाचार के मुद्दों वाली राजनीति
में विश्वास करते हैं /

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